वृद्धाश्रम वह स्थान है जहाँ बुजुर्गों को आश्रय, भोजन और आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए सहारा है जो असहाय या निराश्रित हैं, परंतु आज इन संस्थानों में बढ़ती संख्या समाज के लिए चिंताजनक संकेत है। जिन माता-पिता ने अपना संपूर्ण जीवन बच्चों के पालन-पोषण और सुख-सुविधाओं में लगा दिया, क्या बुढ़ापे में उन्हें वही स्नेह और सम्मान मिल पा रहा है? यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है।
बुजुर्ग परिवार की नींव होते हैं। वे बरगद के वृक्ष की भांति हैं, जो फल भले न दें, पर छाया अवश्य प्रदान करते हैं। किंतु बदलती जीवनशैली, एकल परिवार व्यवस्था और भौतिकवादी सोच ने पारिवारिक संबंधों को कमजोर किया है। आज की युवा पीढ़ी में अधिक धन अर्जित करने की होड़ और व्यस्तता के कारण माता-पिता की देखभाल उपेक्षित होती जा रही है। परिणामस्वरूप अनेक बुजुर्ग स्वयं को अकेला और असहाय महसूस करते हैं तथा वृद्धाश्रम का सहारा लेने को विवश हो जाते हैं।
यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संस्कारों के क्षरण से भी जुड़ी है। यदि बच्चों को बचपन से ही बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाए, विद्यालयों में माता-पिता और बुजुर्गों के आदर का पाठ पढ़ाया जाए तथा परिवार के महत्व से अवगत कराया जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है। चलचित्र, नाटक और सामाजिक अभियानों के माध्यम से भी समाज को जागरूक किया जा सकता है।
आज आवश्यकता है कि हम आत्ममंथन करें और बुजुर्गों को परिवार में उनका उचित स्थान दें। उन्हें प्रेम, सुरक्षा और सम्मान प्रदान करना हमारा नैतिक दायित्व है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता जाएगा। बुजुर्गों की सेवा ही सच्चे संस्कार और सभ्य समाज की पहचान है।
– सीमा त्रिपाठी
शिक्षिका, साहित्यकार व लेखिका
अध्यक्ष, महिला शिक्षक संघ
लालगंज, प्रतापगढ़


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