माँ सारदे तु सुनले मेरी पुकार !

माँ सारदे तु सुनले मेरी पुकार 

कलकत्ता 

माँ सारदे तु सुनले मेरी पुकार ! इस बार तु पार करा दे, मंजिले पुनः पहुँचा दे


तेरी ही तो अंगुली धरे, मै चलना सीखी हूँ ये ममता मई मुझपर


अपनी ममता तु बरसा इस बार ऊँगली नहीं मईया, अपनी पूरी हाथ तु धरा


थी तुझसे मैं अंजान न कर सकी पहेचान मुझे माफ कर दी मईया, थी बालक मैं नादाँ


तुम्हारी लकीरों को काट सके, जो अब तक बना नहीं कोई तलवार जो सारदे को करे दिल से ध्यान पूरा हो जाए सब का अरमान


तेरी हाथीयार जब भी जिसके, हाथ में उठति, तु पीछे नहीं हटति मैया कर्म करने वालो का करति सदा कल्याण मैया तु है बड़ा महान तु है २



जय माता सरस्वती 

शोभा प्रसाद कलकत्ता (बंगाल)


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