सुखपुरा के बुढ़वा शिव मंदिर में शिवलिंग जीर्णोद्धार महायज्ञ, पांचवें दिन पूर्णाहुति व हवन संपन्न
बलिया(राष्ट्र की संपत्ति)
सुखपुरा क्षेत्र के प्रसिद्ध बुढ़वा शिव मंदिर प्रांगण में चल रहे छह दिवसीय शिवलिंग जीर्णोद्धार एवं पुनः प्रतिष्ठा महायज्ञ के पांचवें दिन शनिवार को वैदिक विधि-विधान से पूर्णाहुति और हवन का आयोजन किया गया। पूरे वातावरण में वेद मंत्रों की गूंज, हवन कुंड से उठती पवित्र अग्नि और श्रद्धालुओं की आस्था ने माहौल को भक्तिमय बना दिया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु, महिलाएं, बुजुर्ग एवं युवा उपस्थित रहे। आचार्य सुनील पाण्डेय के निर्देशन में चल रहे इस अनुष्ठान में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराई जा रही हैं। शनिवार को रुद्राभिषेक के उपरांत विधिवत हवन और पूर्णाहुति की गई, जिसे अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
आचार्य सुनील पाण्डेय ने बताया कि रुद्राभिषेक के बाद की जाने वाली पूर्णाहुति संपूर्ण पूजा को पूर्णता, सिद्धि और दिव्य ऊर्जा प्रदान करने वाली अंतिम प्रक्रिया होती है। यह अनुष्ठान के दौरान किए गए मंत्रोच्चार, अभिषेक और हवन से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा को स्थिर करती है। इससे पूजा का संपूर्ण फल भक्तों को प्राप्त होता है और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।
उन्होंने कहा कि “पूर्णाहुति” का अर्थ है पूर्ण आहुति, जो इस बात का प्रतीक है कि पूजा में कोई कमी शेष न रहे। यह अनुष्ठान के दौरान अनजाने में हुई त्रुटियों को दूर कर पूजा को सफल बनाती है। रुद्राभिषेक से प्राप्त मंत्र शक्ति का आशीर्वाद पूर्णाहुति के माध्यम से श्रद्धालुओं तक पहुंचता है।
आचार्य ने यह भी बताया कि यह विशेष पूजा कष्टों, बीमारियों, मानसिक तनाव और ग्रह दोषों के निवारण के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। पूर्णाहुति के दौरान पान के पत्ते, सूखा नारियल, चुनरी, दक्षिणा और अन्य पूजन सामग्री श्रद्धा पूर्वक भगवान शिव को समर्पित की जाती है। यह अंतिम आहुति भगवान से पूर्ण कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है।
मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि रविवार को महायज्ञ के उपलक्ष्य में भव्य भंडारे का आयोजन किया गया है, जिसमें क्षेत्र के सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया गया है। कार्यक्रम को लेकर पूरे गांव में उत्साह का माहौल है और लोग इसे धार्मिक सौभाग्य के रूप में देख रहे हैं।
छह दिवसीय इस धार्मिक आयोजन ने सुखपुरा और आसपास के गांवों में आध्यात्मिक वातावरण का संचार कर दिया है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस अनुष्ठान से क्षेत्र में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा।


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