ऊसे तो आदत है, आँसू झुट मुठ का बहाने का! मुझे दिखाने का,
कलकत्ता
यू तो आँसू पानी सा होता है खुशी हो या गम रंग एक सा होता है
इंसान बदल जाते है अक्सर चेहरे पे नकाब ओढ़े होते है,
मगरमछ की आँसू निकलता है आँसू वही निकलता है मगर,
भीग जाती है आँसुओ से कभी ऐ दामन, फरेबी क्या खूब कहता है, ऊसे तो आदत है, आँसू झुट मुठ का बहाने का! मुझे दिखाने का,
ऊसे तो पाता नहीं ऐ आँसू आता है वही से जहाँ से लाल रंग के खून बहा करते है!
अरे खुदा की रहमत तो देखो इन आँसुओं को खुन के लाल रंग से नहीं बल्कि पानी के रंग से नवाजा है
वरना सह न पाते तुम जैसे लोग आँसू के लाल रंग को देखकर भक्स्छते नहीं खुदा को भी तुम तौहीन करते ख़ुदा को देखकर तुम खुदा से ही सही सर्म तो कर वरना तरप तरप के मर !
शोभा प्रसाद : फ्रॉम बिहार इन (कोलकाता)


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