शीर्षक : आँसुओं का सच और इंसानियत का आईना
कलकत्ता बंगाल
यूँ तो आँसू सदियों से मानव भावनाओं का सबसे सरल, सबसे सच्चा प्रतीक माने जाते हैं।
खुशी हो या ग़म—इनका रंग एक ही दिखाई देता है।
पर सच यह है कि आँखों से गिरने वाला हर आँसू समान होते हुए भी समान नहीं होता।
क्योंकि इन आँसुओं के पीछे छिपी कहानियाँ, दर्द, छल, पीड़ा और संवेदनाएँ अलग-अलग होती हैं।
इंसान भी अजीब है—समय, स्वार्थ और हालात के साथ बदल जाता है।
चेहरों पर नक़ाब ओढ़ लेना आज के दौर की मजबूरी से ज़्यादा आदत बन गया है।
कई चेहरे मुस्कुराहट ओढ़े घूमते हैं, पर दिल में तूफ़ान पलता रहता है।
कई चेहरे रोते दिखते हैं, पर आँसू सिर्फ़ दिखावा होते हैं।
यही वजह है कि असली और नकली आँसू में फर्क करना बेहद मुश्किल हो गया है।
मगरमच्छ के आँसू भी आँसू ही कहे जाते हैं।
इन आँसूओं में भी चमक होती है, पर सच्चाई की गर्माहट नहीं।
दिखने में ये भी इंसानी आँसुओं जैसे लगते हैं—
लेकिन इनमें छल, स्वार्थ और दिखावे की बू होती है।
आज के बदलते दौर में ऐसे नकली आँसू बहुतायत में दिख जाते हैं,
जो अक्सर दामन को गीला करके भी दिल को हल्का नहीं करते।
फरेबी लोग भी कमाल करते हैं—
झूठ-मूठ आँसू बहाकर दुनिया को सहानुभूति दिखाते हैं,
मानो वे ही सबसे बड़े दुखियारे हों।
उन्हें यह नहीं मालूम कि असली आँसू कहाँ से आते हैं।
असली आँसू वहीं से निकलते हैं,
जहाँ दिल ने कभी दर्द से कराहते हुए खून की लकीरें बहाई हों।
जहाँ विश्वास टूटा हो, जहाँ आत्मा खोखी हुई हो,
जहाँ भीतर की टूटन का कोई मरहम न मिला हो।
खुदा की रहमत देखिए इन आँसुओं पर—
अगर ये खून की तरह लाल होते,
तो दुनिया काँप जाती,
तुम जैसे लोग खुदा पर सवाल उठाने से भी न चूकते।
इसलिए ईश्वर ने इन्हें पानी की तरह पारदर्शी बनाया—
साफ, निर्मल, निष्पाप।
ताकि दिल का बोझ हल्का हो सके,
दर्द की तपिश कम हो सके,
और इंसानियत की बची-खुची लौ जलती रह सके।
पर अफसोस की बात यह है कि इंसान छल के इतने बोझ से दब गया है
कि उसे अपने ही आँसुओं की कीमत समझ नहीं आती।
झूठ के सहारे जीने वाले लोग अक्सर सच के सामने टिक नहीं पाते।
वे भूल जाते हैं कि ईश्वर की नज़र से कुछ भी छिपा नहीं।
और जो छल करते हैं,
वही अपने ही झूठ में उलझकर तड़पते रहते हैं।
ज़रा शर्म तो करो उस खुदा से,
जो तुम्हारे गुनाहों पर भी रहमत करता है,
तुम्हें सँभालता है, संभालने के मौके देता है।
वरना तुम अपने ही बनावटीपन, अपने ही दोगलेपन में घुटते रहोगे—
और एक दिन अपने ही छल के बोझ तले दम तोड़ दोगे।


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