कविता में समाज का तीखा चित्रण

 बलिया के कवि डॉ. गया शंकर प्रेमी की कविता में समाज का तीखा चित्रण

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

 जनपद के सियर तहसील अंतर्गत चंदाड़ीह गांव निवासी प्रख्यात कवि डॉ. गया शंकर प्रेमी की कविता समकालीन समाज के अंतर्विरोधों और संवेदनहीनता का सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। उनकी रचना में प्रेम, बलिदान और सामाजिक दृष्टिकोण के दोहरे मानदंडों को बेहद मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। कवि ने अपनी कविता के माध्यम से यह सवाल खड़ा किया है कि समाज प्रेम और बलिदान को किस दृष्टि से देखता है—और यह दृष्टि कितनी भेदभावपूर्ण है।

डॉ. प्रेमी अपनी कविता में यह दर्शाते हैं कि जो लोग प्रेम में असफल होकर जहर खा लेते हैं, उन्हें समाज चोरी-छिपे दफना देता है या जला देता है। ऐसे प्रेमियों की मौत को सामाजिक बदनामी का विषय मानकर उनसे मुंह फेर लिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, सरहद पर देश के लिए प्रेम और कर्तव्य निभाने वाले जवान जब शहीद होते हैं, तो उन्हें हजारों-लाखों लोगों की मौजूदगी में पूरे सम्मान के साथ दफनाया या जलाया जाता है। कवि इसी विरोधाभास को केंद्र में रखकर समाज से तीखे प्रश्न करता है।

कविता यह स्पष्ट करती है कि प्रेम चाहे व्यक्तिगत हो या राष्ट्र के प्रति, दोनों ही त्याग और समर्पण की भावना से उपजते हैं। फिर भी समाज व्यक्तिगत प्रेम को अपराध की तरह और देशभक्ति को गौरव की तरह क्यों देखता है? डॉ. गया शंकर प्रेमी की यह रचना न केवल भावनात्मक रूप से झकझोरती है, बल्कि पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि मूल्यांकन का पैमाना क्या होना चाहिए—मौत का तरीका या भावना की पवित्रता।

उनकी कविता आज के समय में सामाजिक चेतना को जाग्रत करने वाली एक सशक्त आवाज के रूप में सामने आती है।

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