गांव में समरसता कायम किया जाए
सिकन्दरपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले हथौज गांव में हाल ही में हुई प्रशासनिक कार्रवाई के बाद माहौल संवेदनशील बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में सरकारी भूमि पर बने एक मकान को ध्वस्त किया गया। प्रभावित परिवार दलित समुदाय से जुड़ा बताया जा रहा है, जिस कारण इस घटना ने सामाजिक स्तर पर गहरी प्रतिक्रिया उत्पन्न की है।
कुछ लोगों द्वारा इस कार्रवाई के बाद जश्न मनाए जाने की बातें भी सामने आई हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अमानवीय हैं। किसी का घर गिरना सिर्फ कानूनी मामला नहीं होता, बल्कि एक परिवार के आशियाने, यादों और सुरक्षा के टूटने का दर्द भी साथ लाता है। ऐसे समय में संवेदना की जगह उत्सव मनाना समाज की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यदि कार्रवाई न्यायालय के स्पष्ट आदेश पर हुई है, तो यह प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी का हिस्सा है। कानून जाति, वर्ग या हैसियत देखकर नहीं चलता। लेकिन इस तरह की कार्रवाई को जातीय दृष्टिकोण से देखना और उस पर खुशी जताना सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाता है। गांव का वातावरण आपसी सम्मान और सहअस्तित्व पर टिका होता है, न कि कटुता और उपहास पर।
प्रशासनिक संकेत यह भी दे रहे हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जों के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। आज अगर किसी एक परिवार पर कार्रवाई हुई है, तो भविष्य में अन्य अवैध कब्जाधारियों पर भी कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हो सकती है। इसलिए यह भ्रम पालना कि कानून केवल एक वर्ग पर लागू होगा, उचित नहीं है।
भूमि विवादों में अक्सर अधूरी जानकारी, अफवाहें और राजनीतिक रंग माहौल को बिगाड़ देते हैं। जरूरत इस बात की है कि लोग अपने भूमि अभिलेखों की स्थिति स्पष्ट रखें, निर्माण से पहले वैधानिक अनुमति लें और किसी भी विवाद की स्थिति में न्यायालय की शरण लें। कानून में अपील और पुनर्विचार की पूरी व्यवस्था मौजूद है।
गांव के जिम्मेदार नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों की भूमिका इस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें आगे बढ़कर लोगों को समझाना चाहिए कि किसी की विपत्ति पर खुशी मनाना इंसानियत नहीं है। सामाजिक ताना-बाना आपसी विश्वास से बनता है, और ऐसी घटनाएं उसे कमजोर करती हैं।
हथौज गांव की यह घटना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी एक नैतिक कसौटी भी है—क्या हम कानून का सम्मान करते हुए मानवीय संवेदनाओं को भी जिंदा रख पाएंगे।



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