प्रेमाश्रु प्रभु कृपा का प्रतीक

 


प्रेमाश्रु प्रभु कृपा का प्रतीक

-साध्वी आर्या पण्डित


सिकन्दरपुर (बलिया)। भागवती कथा सुनते-सुनते रोमाञ्च हो जाय, नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे तो समझो भगवान की कृपा हो रही है। जीव अब ईश्वर के सन्निकट होता है तब समस्त दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं और जब वह संसारी होता है तब उसे दुर्गुण घेर लेते हैं। उक्त बातें साध्वी आय पण्डित ने श्री बनस्खण्डी नाथ (श्री नागेश्वर नाथ महादेव) मठ परिसर इहाँ बिहरा (हाँ), जिला बलिया में जारी अद्वैत शिवशक्ति कोटि होमात्मक राजसूय महायज्ञ के छठें दिन कहीं, वे व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को सम्बोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि व्योमवाणी से सशंकित कन्स जेल में निरुद्ध वसुंदन देवकी पर कड़ा पहरा लगा रक्खा था तथापि जब कृष्ण अवतार लेते हैं तो उनकी माया से सभी लोग सो जाते हैं। वसुदेवजी कृष्ण की अनुज्ञा से उन्हें उन्हें नन्दगृह पहुँचाकर वहाँ जन्मी नवजात कन्या लेकर जेल में आते हैं, तब सभी जाग उठते हैं। कन्स एक माह के अन्दर जन्मे सभी बच्चों को मारने का आदेश देता है।

इसी क्रम में पूतना भी कृष्ण को मारने के लिए स्तनों में विष लगाकर नन्द गृह पहुँची । हाव-भाव कर स्तन पिलाने लगी तो कन्हैया उसके प्राण खींच उसे निष्प्राण कर दिये, तथापि कृष्ण ने उसे माता जैसी सद्‌गति दी। पूरना पूर्व जन्म में राजा बलि की पुत्री थी। वामन रूपधारी विष्णु ने कुलपूर्वक बलि से तीन पग भूमि माँगी। बलि ने गुरु शुक्राचार्य की बात भी न मानी। बलि तीन पग देना स्वीकार कर ले गये। बलिपुत्री रत्नमाला ; वामन के रूप पर मुग्ध हो गयी कि यदि यहशिशु होता तो इसे स्तनपान कराती किन्तु पिता के छले जाने पर सोची कि यदि क्षमता होती तो इसे मार डालती। कन्हैया ने उसकी दोनों इच्छायें पूर्ण की। कृष्ण ने पाँच वर्ष की आयु में मिट्टी न खाने की सफाई देते हुए अपना मुँह खोलकर माता यशोदा को समस्त ब्रह्माण्डों का दर्शन कराया।

साध्वी जी ने बताया कि कन्हैया, उखल बन्धन के बहाने शाप वश थमलार्जुन बने नलकूबर का उद्धार किया जैसा कि पूतना का उद्धार किया। कन्हैया ने कन्स के भेजे अनेक असुरों का संहार तो किया ही किन्तु ब्रह्मा का मोह तथा गोवर्धन की पूजा व्रजवासियों द्वारा करवाकर इन्द्र का गर्व भी तोड़ा। जो व्रजवासियों को भगवान से पृथक करने की कुचेष्टा करता है, भगवान उस पर कुपित होते हैं। नागनाथ लीला, नागपत्नियों द्वारा प्रार्थना और उन सबको रमणक द्वीप में निवास देना- इस सारे प्रसंगों पर विद्वत्ता पूर्ण वक्तव्य से साध्वी जीने श्रोता समाज को मुग्ध कर दिया। कहा कि गोलोक से चौरासी कोस में व्रज उतारा गया। जहाँ वृन्दावन, यमुना जी तथा गोवर्धन आदि नहीं' वहाँ राधाजी रहना पसन्द नहीं।


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